Thursday, August 28, 2008

Saturday, August 02, 2008

वंश कुतुबमीनार के पास

मैंने कुतुबमीनार भी देखा।

Friday, April 25, 2008

अगर तुम

अगर तुम अपना दिमाग ठीक रख सकते हो जबकि तुम्हारे चारों ओर सब बेठीक हो रहा हो और लोग दोषी तुम्हे इसके लिए ठहरा रहे हों...
अगर तुम अपने उपर विश्वास रख सकते हो जबकि सब लोग तुम पर शक कर रहे हों..पर साथ ही उनके संदेह की अवज्ञा तुम नहीं कर रहे हो..
अगर तुम अच्छे दिनों की प्रतीक्षा कर सकते हो और प्रतीक्षा करते हुए उबते न हो..या जब सब लोग तुम्हें धोखा दे रहे हों पर तुम किसी को धोखा नहीं दे रहे हो...
या जब सब लोग तुमसे घृणा कर रहे हों पर तुम किसी से घृणा नहीं कर रहे हो...साथ ही न तुम्हें भले होने का अभिमान हो न बुद्धिमान होने का....
अगर तुम सपने देख सकते हो पर सपने को अपने उपर हावी न होने दो, अगर तुम विचार कर सकते हो पर विचारों में डुबे होने को अपना लक्ष्य न बना बैठो...
अगर तुम विजय और पराजय दोनों का स्वागत कर सकते हो पर दोनों में से कोई तुम्हारा संतुलन नहीं बिगाड़ सकता हो...
अगर तुम अपने शब्दों को सुनना मूर्खों द्वारा तोड़े मरोड़े जाने पर भी बर्दाश्त कर सकते हो और उनके कपट जाल में नहीं फंसते हो...
या उन चीजों को ध्वस्त होते देखते हो जिनको बनाने में तुमने अपना सारा जीवन लगा दिया और अपने थके हाथों से उन्हें फिर से बनाने के लिए उद्यत होते हो..
अगर तुम अपनी सारी उपलब्धियों का अंबार खड़ा कर उसे एक दांव लगाने का खतरा उठा सकते हो, हार होय की जीत...
और सब कुछ गंवा देने पर अपनी हानि के विषय में एक भी शब्द मुंह से न निकालते हुए उसे कण-कण प्राप्त करने के लिए पुनः सनद्ध हो जाते हो...
अगर तुम अपने दिल अपने दिमाग अपने पुट्ठों को फिर भी कर्म नियोजित होने को बाध्य हो सकते हो जबकि वे पूरी तरह थक टूट चुके हों...जबकि तुम्हारे अंदर कुछ भी साबित न बचा हो...सिवाए तुम्हारे इच्छा बल के जो उनसे कह सके कि तुम्हें पीछे नहीं हटना है....
अगर तुम भीड़ में घूम सको मगर अपने गुणों को भीड़ में न खो जाने दो और सम्राटों के साथ उठो बैठो मगर जन साधारण का संपर्क न छोड़ो...
अगर तुम्हें प्रेम करने वाले मित्र और घृणा करने वाले शत्रु दोनों ही तुम्हे चोट नहीं पहुंचा सकते हों...
अगर तुम सब लोगों को लिहाज कर सको लेकिन एक सीमा के बाहर किसी का भी नहीं, अगर तुम क्षमाहीन काल के एक एक पल का हिसाब दे सको.....
....तो यह सारी पृथ्वी तुम्हारी है...और हरेक वस्तु तो इस पृथ्वी पर है उस पर तुम्हारा हक है....वत्स तुम सच्चे अर्थों में इंसान कहे जाओगे....
- रुडयार्ड किपलिंग ( यह कविता किपलिंग ने अंग्रेजी में लिखी है जिसका कवि हरिवंश राय बच्चन ने हिंदी में अनुवाद अपनी आत्मकथा में किया है....कविता मुझे अलग अलग समय में काफी प्रेरणा देती है...जीने का साहस देती है....)

Monday, April 14, 2008

नई राहों पर

दोस्तों,

सात अप्रैल 2008 को मैंने लाइव इंडिया को अलविदा कह दिया...यहां मैं ईटीवी से सितंबर 2007 में आया था...अब मैंने भोजपुरी इन्फोटेनमेंट चैनल महुआ ज्वाएन किया है..प्रोड्यूसर पद पर....चैनल का आफिस फिल्म सिटी नोयडा में है....पर्ल मीडिया लि. नामक कंपनी प्रज्ञा नामक धार्मिक और होलिस्टिक हेल्थ चैनल पहले से चला रही है....कंपनी के प्रोमोटर श्री पीके तिवारी जी हैं...जिनका सेंचुरी कम्युनिकेशंस लि. और पिक्सिआन जैसी कंपनियां हैं....इलेक्ट्रानिक मीडीया में यह बड़ा पुराना और सम्नानित समूह है जो कई सेटेलाइट चैनलों को पोस्ट प्रोडक्शन साल्यूशन प्रोवाइड करता है....

Tuesday, April 01, 2008

रामोजी फिल्म सिटी में


रामोजी फिल्म सिटी एक सपनीली दुनिया है..मुझे यहां ज्यादा समय रहने का मौका नहीं मिल सका...दैनिक भास्कर पानीपत में काम करता था सीनियर सब एडीटर के पद पर..तभी एक दिन फोन आया कि आपका ईटीवी हैदराबाद में इंटरव्यू है...आने जाने का एसी 3 का किराया दिया जाएगा....मैं तैयार हो गया..इंटरव्यू के लिए। दस साल प्रिंट मीडिया में काम करने के बाद इलेक्ट्रानिक मीडिया में जाने के बारे में सोचता भी था...आईआईएमसी से निकला था तो बहुत से दोस्त तुरंत ही इलेक्ट्रानिक मीडिया में चले गए थे..
खैर वह जनवरी की बड़ी ही सर्द सुबह थी जब मैं दक्षिण के शहर हैदराबाद के लिए चला...सिकदंराबाद स्टेशन पर रामोजी फिल्म सिटी( आरएफसी) की गाड़ी हमारा इंतजार कर रही थी...आरएफसी में गया तो शांति निकेतन गेस्ट हाउस में ठहराया गया....इंटरव्यू के दौरान ही तीन दिनों तक रामोजी फिल्म सिटी के गेस्ट हाउस में रहा...ईटीवी के एमपी चैनल में मेरा मिड्ल लेवल जर्नलिस्ट के पद पर चयन हो गया...उसके बाद सात महीने मैंने ईटीवी में गुजारे...एमपी चैनल में....हमारे चैनल के इंचार्ज योगेश जोशी और रुपेश श्रोती से सानिध्य में...
आठ महीने के अनुभव बड़े अच्छे रहे...यहां आने पर पता चला कि यहां चार सौ हिंदी पत्रकारों की जमात रहती है....इसमें ज्यादातर लोग वनस्थली पुरम में रहते हैं....खैर बात करते हैं रामोजी फिल्म सिटी की जिसे दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म सिटी होने का गौरव प्राप्त है...हैदराबाद शहर से बाहर विजयवाड़ा रोड पर इसका विशाल कैंपस है....हर रोज कई हजार टूरिस्ट इस फिल्म सिटी को देखने आते हैं...यहां दर्जनों हिंदी फिल्मों की भी शूटिंग हुई है...
रामोजी फिल्म सिटी में ही ईटीवी समूह के 12 भारतीय भाषाओं के चैनलों के हेड आफिस हैं...इनमें से चार हिंदी के चैनल भी हैं...इसका मतलब की पत्रकारों की एक बड़ी बिरादरी यहां काम करती है...ईटीवी इलेक्ट्रानिक मीडिया की बड़ी नर्सरी बन चुकी है...सभी बड़े चैनलों में भी ईटीवी के लोग पहुंच चुके हैं...
हरी भरी पहाड़ियों के बीच रामोजी फिल्म सिटी का नजारा बड़ा सुहावना है....विशाल दफ्तर...लंबी चौड़ी कैंटीन और संपन्न रेफरेंस लाइब्रेरी...ईटीवी की खास बातों में से एक है...ईटीवी में काम करने वाले कई लोग बहुत सी बातों को लेकर कुंठित भी रहते हैं पर मैं यहां उनकी चर्चा नहीं करना चाहूंगा....
एक अनुशासन है जिसके बदौलत रामोजी फिल्म सिटी में सारी व्यवस्था चलती है....कई दर्जन बसें रोज कर्मचारियों को लेकर फिल्म सिटी में आती हैं....फिर उन्हें छोड़ने के लिए घर भी जाती हैं....पहाड़ों के बीच जब सूरज की पहली किरण फिल्म सिटी में पड़ती है तो सुबह देखने लायक होती है....विशाल हरे भरे पार्क और एक से बढ़कर एक शूटिंग लोकेशन्स रामोजी फिल्म सिटी की विशेषता है....हमेशा यहां किसी न किसी फिल्म की शूटिंग चलती रहती है....रामोजी फिल्म सिटी के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए आप उनकी आफिशियल वेबसाइट पर जा सकते हैं....
http://www.ramojifilmcity.com/
-विद्युत प्रकाश मौर्य

पहली बार बनारस में



बचपन में जब यज्ञोपवीत संस्कार होता है तो पुरोहित बालक पूछता है- कहां जा रहे हो तो वह बोलता है काशी...काशी क्यों तो पढ़ाई करने....काशी यानी विद्या अध्ययन का पर्याय....विद्वानों की नगरी...संयोग कुछ ऐसा बना की इंटर की परीक्षा पास करने के बाद मेरी भी इच्छा बनारस में पढ़ाई करने की हुई...मैंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए मन बनाया...मार्च का महीना था...प्रवेश की तारीखों के बारे में कुछ नहीं पता था। मैं और मेरे मित्र विष्णु वैभव दोनों एक शाम सोनपुर से वाराणसी पैसेंजर में सवार हुए...सुबह चार बजे ट्रेन छोटे छोटे दर्जनों स्टेशनों को पार करती हुई बनारस पहुंच गई...तब वाराणसी सोनपुर के बीच छोटी लाइन थी जो अब ब्राड गेज में बदल चुकी है। बनारस रेलवे स्टेशन का आकार भी बाहर से मंदिर जैसा ही है....हमारे पास संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर का पता था। वे वहां बीएड विभाग के हेड थे...कुछ नाम था शायद वाचस्पति द्विवेदी....संपूर्णानंद यूनीवर्सिटी वाराणसी जंक्शन रेलवे स्टेशन के पास ही है। सुबह सुबह हमने उनका दरवाजा खटखटाया...उन्होंने समान्य शिष्टाचार के बाद सलाह दी... पहली बार बनारस आए हो तो दोनों यहां से सीधे दश्वाश्वमेध घाट चले जाओ वहां गंगा जी में स्नान कर लेना उसके बाद वहीं से बीएचयू चले जाना...तब तक नौ बज जाएंगे और यूनीवर्सिटी खुल भी जाएगी....हमने विद्वान पुरूष की राय पर अमल किया...सुबह सुबह दशाश्वमेध घाट पहुंच गए... वहां देखा हजारों लोग गंगा स्नान कर रहे हैं। गंगा जी बनारस में उत्तर-दक्षिण बहती हैं। इसलिए सुबह के सूरज की पहली किरण दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर आकर पड़ती है। उसके बाद वाराणसी के घाटों का सौंदर्य कई गुना बढ़ जाता है। तभी बनारस की सुबह का कई कविओं ने अपने अपने तरीके से गुणगान किया है। बनारस में गंगा स्नान करने के बाद हमने बाबा विश्वनाथ के दर्शन की सोची... बाहर निकल कर एक गली में घुस गए...कई घंटे चक्कर लगाने के बाद भी भोले बाबा का दरबार नहीं मिला...तब जाकर याद आया कि बनारस की गलियों के बारे में भी कितने तरह के किस्से मशहूर हैं। खैर हमने किसी से बाहर सड़क पर निकलने का रास्ता पूछा और आटो रिक्सा पर बैठकर पहुंच गए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के गेट पर....विशाल सिंह द्वार और उसके बाहर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की विशाल मूर्ति....खैर हम गेट के अंदर घुसे... हमारे पास बीएचयू के मेडिकल कालेज की कैंटीन में काम करने वाले बीएन तिवारी जी का पता था...मेडिकल कालेज की तीसरी मंजिल पर स्थित कैंटीन में तिवारी जी मिले...उन्होंने बातें करने से पहले चाय नास्ता कराया....फिर हमने उन्हे आने का उद्देश्य बताया....उन्होंने सेंट्रल आफिस जाने को कहा... इस दौरान हमें बीएचयू के भव्य परिसर का साक्षात्कार हुआ। फार्म खरीदने के साथ तय किया किसी भी तरह यहीं पढ़ाई करने आना है। प्रवेश परीक्षा के लिए आवेदन करने के बाद हमने लंका पर आकर बीएचयू प्रवेश परीक्षा की गाइड खरीदी...दुबारा प्रवेश परीक्षा देने बनारस आया...इंट्रेस के रिजल्ट में 1990 में सेकेंड टाप पोजीशन पर आया था....इसके बाद में सामाजिक विज्ञान संकाय में इतिहास (प्रतिष्टा) में नामांकन लिया....उसके बाद पांच साल बीएचयू कैंपस में गुजारे....जिसके सैकड़ो खट्टे-मीठे अनुभव हैं।

-विद्युत प्रकाश मौर्य

Monday, October 08, 2007

मेरी पसंद

जिदंगी है बहार फूलों की
दास्तां बेशुमार फूलों की
तुम क्या आए तसव्वुर में
आई खुशबू हजार फूलों की।

गुजरे हैं जिन राहों से हम तुम साथ साथ
वो राहें रोक रोक कर पूछेंगी, बता तेरे हमसफर कहां गए।